शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

🌹❄ *श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य* ❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌟 श्रीगोपदेवी-लीला :

श्रीकृष्ण -

(पद)

धीरज रहत नहिं प्रेम-मग पग धरि।
आदि अंत जाकौ न बतायौ कोउ,
थकित रहत मन-बुधि बिधि-हर-हरि।।
बार-बार मैं हूँ बिचार करि देखूँ नित,
भूलि जात गेहु, नीर आवत दृगन भरि।
प्रेमी प्रेम पात्र सूर गायौ है अभेद भेद,
डरत न काहू सौं सेवक ज्यौं नरहरि।।

(पद)

अति ही कठिन है निगम पथ चलिबौ।
कठिन सौं कठिन जगत रीत देखियत,
गुरुजन-डर नित हिय में उछलिबौ।।
प्रेम पंथ ग्रंथन में गायौ है अनेक भाँति,
आवत न अंत निज पिय कौ मचलिबौ।
प्रीत जो सनातन, ताहि जानत ना ओछौ मन,
सूर कहा जानै ताहि बिना नैन मिलिबौ।।

श्रीजी- सखी, कहा ये ही हैं स्यामसुंदर?

सखी- हाँ, प्यारी! ये ही हैं। अब नैन भरि देखि लेऔ!

श्रीजी-

(पद)

कृष्ण मन-मोहन नैन बिसाल।
बंक मनोहर चितवनि चितवत, बन ते आवत लाल।।
सुंदर अमल कमल-दल सोहत मुसिकन मंद रसाल।
हरिबल्लभ किमि रूप कहौं सखि, मोहन मदन गुपाल।।

पद (रांग-नूर सारंग, तीन ताल)

अँखियन याही टेव परी।
कहा करूँ बारिज मुख ऊपर लागत ज्यौं भँवरी।।
हरखि-हरखि प्रीतम मुख निरखत, रहत न एक घरी।
ज्यौं-ज्यौं राखत जतनन करि-करि, त्यौं-त्यौं होत खरी।।
गड़ि मरि रहीं रूप-जलनिधि में प्रेम-पियूष भरी।
सूरदास गिरिधर नग परसत लूटत निधि सगरी।।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824
  मोबाइल नं.: 9009290042

🌹 एक बार प्रेम से बोलिए ...
🙌🏻 जय जय श्री राधे .....🙌🏻
🌹 प्यारी श्री राधे .......  🌹

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

🌹❄ *श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य* ❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌟 श्रीगोपदेवी-लीला :

(श्लोक)

हे देव! हे दयित! हे भुवनैकबन्धो!
हे कृष्ण! हे चपल! हे करुणैकसिन्धो!
हे नाथ! हे रमण! हे नयनाभिराम!
हा हा कदानुभवितासि पदं दृशोर्मे।।

सखि- हे सखी! अब नँदनँदन कौ बन सौं आयबे कौ समय निकट ही आय गयौ है। सो अब प्यारी जी कूँ सीस-महल के झरोखान में विराजमान कर देऔ, वहीं सौं ये प्यारे के दरसन करि लेयँगी और या बात की काहूँ कूँ खबर हू न परैगी।

(श्रीकृष्ण-मधुमंगल-आगमन)

समाजी-

पद (राग पूरिया, ताल-चौताल)

हाँकें हटक-हटक गाय ठठक-ठठक रहीं,
गोकुल की गली सब साँकरी।
जारी-अटारी, झरोखन मोखन झाँकत,
दुरि-दुरि ठौर-ठौर ते परत काँकरी।।
कुंद कली चंप-कली बरषत रस-भरी,
तामें पुनि देखियत लिखे हैं आँक री।
नंददास प्रभु जहीं-जहीं द्वारें ठाड़े होत,
तहीं-तहीं माँगत बचन लटकि-लटकि जात,
काहू सौं हाँ करी, काहू सौं ना करी।।

पद (राग-गौरी, तीन ताल)

कमल मुख सोभित सुंदर बेनु।
मोहन ताल बजावत, गावत, आवत चारें धेनु।।
कुंचित केस सुदेस बदन पर, जनु साज्यौ अलि सैनु।
सहि न सकत मुरली मधु पीवत, चाहते अपने ऐनु।।
भृकुटी कुटिल चाप कर लीने, भयौ सहायक मैनु।
सूरदास प्रभु अधर-सुधा लगि उपज्यौ कठिन कुचैनु।।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824
  मोबाइल नं.: 9009290042

🌹 एक बार प्रेम से बोलिए ...
🙌🏻 जय जय श्री राधे .....🙌🏻
🌹 प्यारी श्री राधे .......  🌹

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

रविवार, 25 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

🌹❄ *श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य* ❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌟 श्रीगोपदेवी-लीला :

श्रीजी- ‘हे सखि, गुरुणापि प्राधानेन न मे स्मरणं भवति’- हे श्यामे, मैं तो चित्त कूँ स्थिर करि कैं बोहौत विचार करूँ हूँ, परंतु मोकूँ नैंक हू स्मरण नहीं होय है। आप ही बताय देऔ, मोसौं ऐसी कहा भारी चूक परि गई है।

श्रीजी- ‘अयि मिथ्यासरले, तिष्ठ तिष्ठ’-

(श्लोक)

वितन्वानस्तन्वा मरकतरुचीनां रुचिरतां
पटान्निपक्रान्तोऽभूद् धृतशिखिशिखिण्डो नवयुवा।
भ्रुवं तेनाक्षिप्ता किमपि वसतोन्मादितमतेः
शशीवृत्तो वह्निः परमहह बर्ह्निमय शशी।।
अयि निठुर चित्रै, तैंने ही तो चित्रपट दिखराय कैं मेरी यह गति कर दीनी है।
सखी- क्यौं, प्यारी जू! वा चित्रपट में कहा हौ?

श्रीजी- अरी कपटवादिनी, वह चित्रपट नहीं हौ वा पट में तो एक युवा पुरुष बैठ्यौ हौ। स्याम वा कौ वर्ण हौ। मरकत मणि की सी मनोहर अंग कान्ति ही। मस्तक पै मोरपिच्छ कौ गुच्छ सौभा दै रह्यौ हौ। कंठ सौं पाद पर्यन्त बनमाला लहराय रही ही। वह नवघन-किसोर चित कौ चोर धीरें-धीरें वा पट कूँ तजि निकस्यौ और निकसि कैं मो माऊँ मदमातौ मुस्कावतौ आवन लग्यौ। मैंने लज्जा और भय के मारें नेत्र मूँद लीने; परंतु देखूँ तो वह तो मेरे हृदय में ठाड़ौ-ठाड़ौ मुस्काय रह्यौ है। वह मेरे नयन द्वार सौं मेरे हृदय भवन में घुसि आयौ है और वाने मेरौ मन-मानिक चुराय मोकूँ बावरी कर दियौ है। मोकूँ तब सौं ससि-किरन तौ अग्नि की ज्वाला समान लगै है और अग्नि की ज्वाला ससि-किरन तुल्य लगै है।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824
  मोबाइल नं.: 9009290042

🌹 एक बार प्रेम से बोलिए ...
🙌🏻 जय जय श्री राधे .....🙌🏻
🌹 प्यारी श्री राधे .......  🌹

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

🌹❄ *श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य* ❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌟 श्रीगोपदेवी-लीला :

श्रीजी- ‘हे सखि, गुरुणापि प्राधानेन न मे स्मरणं भवति’- हे श्यामे, मैं तो चित्त कूँ स्थिर करि कैं बोहौत विचार करूँ हूँ, परंतु मोकूँ नैंक हू स्मरण नहीं होय है। आप ही बताय देऔ, मोसौं ऐसी कहा भारी चूक परि गई है।

श्रीजी- ‘अयि मिथ्यासरले, तिष्ठ तिष्ठ’-

(श्लोक)
वितन्वानस्तन्वा मरकतरुचीनां रुचिरतां
पटान्निपक्रान्तोऽभूद् धृतशिखिशिखिण्डो नवयुवा।
भ्रुवं तेनाक्षिप्ता किमपि वसतोन्मादितमतेः
शशीवृत्तो वह्निः परमहह बर्ह्निमय शशी।।

अयि निठुर चित्रै, तैंने ही तो चित्रपट दिखराय कैं मेरी यह गति कर दीनी है।

सखी- क्यौं, प्यारी जू! वा चित्रपट में कहा हौ?

श्रीजी- अरी कपटवादिनी, वह चित्रपट नहीं हौ वा पट में तो एक युवा पुरुष बैठ्यौ हौ। स्याम वा कौ वर्ण हौ। मरकत मणि की सी मनोहर अंग कान्ति ही। मस्तक पै मोरपिच्छ कौ गुच्छ सौभा दै रह्यौ हौ। कंठ सौं पाद पर्यन्त बनमाला लहराय रही ही। वह नवघन-किसोर चित कौ चोर धीरें-धीरें वा पट कूँ तजि निकस्यौ और निकसि कैं मो माऊँ मदमातौ मुस्कावतौ आवन लग्यौ। मैंने लज्जा और भय के मारें नेत्र मूँद लीने; परंतु देखूँ तो वह तो मेरे हृदय में ठाड़ौ-ठाड़ौ मुस्काय रह्यौ है। वह मेरे नयन द्वार सौं मेरे हृदय भवन में घुसि आयौ है और वाने मेरौ मन-मानिक चुराय मोकूँ बावरी कर दियौ है। मोकूँ तब सौं ससि-किरन तौ अग्नि की ज्वाला समान लगै है और अग्नि की ज्वाला ससि-किरन तुल्य लगै है।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹 एक बार प्रेम से बोलिए ...
🙌🏻 जय जय श्री राधे .....🙌🏻
🌹 प्यारी श्री राधे .......  🌹

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

🌹❄ *श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य* ❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌟 श्रीगोपदेवी-लीला :

पद (राग आसावरी, तीन ताल)

बात हिलग की कासौं कहियै।
सुन री सखी बिबस्था तन की,
समुझि-समुझि मन चुप करि रहियै।
मरमी बिना मरम को जाने,
यह उपहास जानि जिय सहियै।
चत्रभुज प्रभु गिरिधरन मिलैं जब,
तबहीं सब सुख संपत्ति लहियै।।

सखी- हे प्यारी! कछू तो कहौ, स्वजनन के समीप गोपन करिबे तैं मंगल नहीं होय है।

श्रीजी- ‘अयि निष्ठुरे चित्रलेखे, त्वमेव पृच्छस्यपि नः?’ – अरी निष्ठुर, और तो बूझैं हैं सों बूझैं हैं; तू हू मोते बूझै है?

सखी- ‘हे राधे, कर्हिचिदपराद्धस्मीति न स्मरामि’- हे किशोरी जू, मोते कबहुँ अपराध बनि गयो है- सो तो मोकूँ स्मरण नहीं है।

श्रीजी- ‘अयि निष्कृपे, कस्मादेवं भण्सि, स्मृत्वा पश्य’- अरी क्रूर चित्रे, तू ऐसी बोलन काहे कूँ बोलै है- नैंक स्मरण करिकैं देख।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹 एक बार प्रेम से बोलिए ...
🙌🏻 जय जय श्री राधे .....🙌🏻
🌹 प्यारी श्री राधे .......  🌹

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

बुधवार, 21 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

🌹❄ *श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य* ❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌟 श्रीगोपदेवी-लीला :

पद (राग आसावरी ताल, चौताल)
कृष्न नाम जब ते मैं स्रवन सुन्यौ री आली,
भूली री भवन मैं तौ बावरी भई।
भरि-भरि आवत नैन, चितहू न परत चैन,
मुखहू न फुरत बैन, तन की दसा कछु औरही भई।
जेतेक नेम-धरम कीने मैं बहुत बिधि,
अंग अंग भई हौं तौ स्रवन मई।
नंददास प्रभु जाके स्रवन सुनें यह गति भई,
माधुरी मूरति कैधों कैसी दई।।

(दोहा)
प्रानन ते प्यारी अहो सखियौ! तुम सुनि लेहु।
जानौ तुम बरनन करौ, चित्र तासु लिखि देहु।।
सुन्यौ हमहुँ कछु नंदसुत अति मन हर तन श्याम।
चित्र देखि मैं परखिहौं जाहि सराहत बाम।।

श्रीजी- हे मेरी मन भावती सखियौ! जिन कौ तुम बरनन करि रही हौ, उन रूप-सागर कौ एक चित्र तौ मोकूँ दिखाऔ।
ललिता- हे प्रिय चित्रे! तुम या कला में परम निपुन हौ, सो स्याम सुंदर कौ एक सुंदर चित्र लिखि कैं प्यारी कूँ दरसन कराऔ।
चित्रा- हाँ, अब ही लाऊँ।

(श्रीकृष्ण कौ चित्र श्रीजीकूँ दिखावैं)
सखी- हैं सखी! प्यारी कूँ ये कहा भयौ, ये तौ चित्र देखि चित्रलिखी सी रहि गईं। अबही ते प्रेम के प्रबाह में कहा लोकलाज बहि गई? अपनो चित्त प्यारे के अरपन करि कहा बेचैन है गई? किसोरी प्यारी, चित्र कूँ देखि कैं यह आपकी कहा गति भई? ने तो खोलौ, कछू मोते बोलौ तो सही।

श्रीजी- सखी, कछू बात नायँ। मोकूँ नींद आवै है सो सोयबौ चाहूँ हूँ।
(श्रीजी कूँ सयन कराय दै हैं)

श्रीजी- (सयन-अवस्था में) प्यारे, या सुंदर मुखारबिंद पै बलिहारी जाऊँ ये मुख सुंदरता की रासि है।

(श्लोक)
मधुरं मधुरं वपुरस्य विभोर्मधुरं मधुरं वदनं मधुरम्।
मृदुगन्धि मृदुस्मितमेतदहो मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम्।।

भावार्थ- अहा मेरे मोहन चित-चोर! तुम्हारौ समस्त श्रीअंग कितनौ मधुर है-मधुर है! ता पै जो मुख-कमल है, सो तौ मधुर है, मधुर है, मधुर है। और ता मुख-कमल पै जो सुगंधित भीनी हँसन है, सो तो हाय, हाय, मधुर है, मधुर है, मधुर है, मधुर है। मधुरातिमधुर है। अहा, कहा यह माधुर्य की रासि है कि साच्छात् मेरे प्रान ही हैं? जो मेरे ही प्रान हैं तो मोते दूर कहाँ जाय रहे हौ? नैंक तो ठहरो, कहा चले ही जाओगे? अच्छौ, जाऔ चले जाऔ, मैं आप ही पतौ लगाय लऊँगी। (चौंकि कै उठनौ-इन-उत कूँ देखनौ)

सखी- हे प्यारी जू! कहा भयौ, आप इत-उत कूँ क्यौं देखि रही हौ? कहा कोउ बस्तु खोय गई है?

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

सोमवार, 19 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

🌹❄ *श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य* ❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌟 श्रीगोपदेवी-लीला :

(सवैया)

मोतिन की सुथरी दुलरी बर, सोहत सुंदर सीस टिपारौ ।
आनन पानन रंग रच्यौ, निरखैं चखि चंचल लोचन तारौ ।।
गोकुल गाँव गली बिहरैं लिएं कंजकली कर रूप उज्यारौ।
गुच्छन के अवतंस लसैं सिखिपिच्छन अच्छ किरीट बनायौ।
पल्लव लाल समेत छरी कर-पल्लव में मतिराम सुहायौ।।
गुंजन के उर मंजुल हार निकुंजन ते कढ़ि बाहर आयौ।
आज कौ रूप निहारि, सखी! हम आजहि आँखिन कौ फल पायौ।।

(राग भैरव, ताल चौताल)

ऐसे गोपाल निरखि तिल-तिल तन वारौं।
नवकिसोर मधुर मुरति सोभा उर धारौं।।
अरुन तरुन कंज नयन, मुरली कर राजै।
ब्रजजन-मन-हरन बैनु मधुर-मधुर बाजै।।
ललित बर त्रिभंग सु-तन बनमाला सोहै।
अति सुदेस कुसुम-पाग उपमा कौं को है।।
चरन रुनित नूपुर, कटि किंकिनि कल कूजै।
मकराकृति कुंडल छबि सूर कौन पूजै।।

 (श्लोक)

तत्कैशोरं तच्च वक्त्रारविन्दं तत्कारुण्यं ते च लीलाकटाक्षाः।
तत्सौन्दर्यत सा च मन्दस्मितश्रीः सत्यं सत्यं दुर्लभं दैवतेषु।।

अर्थ- अरी सखी, नटनागर बिहारी श्रीकृष्णचंद्र की वह नवकिसोर-अवस्था, वह मुखारबिन्द, वह करुणा, वे लीलाकटाच्छ, वह सौंदर्य, वह मुसकान-माधुरी देवतान में हू दुर्लभ है।

(पर्दा में)

श्रीजी- अहाहा! यह मधुर नाम मोय कौन नें सुनायौ? कितनो मधुर है? कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण!

(श्लोक)

तुण्डे ताण्डविनी रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये
कर्णक्रोडकडम्बिनी घटयते कर्णार्बुदेभ्यः स्पृहाम्।
चेतःप्रांगणसंगिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिं
नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी।।

भावार्थ- ‘कृष्ण’- ये द्वै अच्छर जिह्वा बोल है तौ अनन्त जिह्वान की आकांक्षा उदय करावै हैं। ‘कृष्ण’- ये द्वै वर्ण कर्णन में प्रबेस करत ही दस कोटि कर्णन की लालसा करावै हैं। ‘कृष्ण’- ये द्वै अच्छर अंतःकरण में प्रकट होत ही समस्त इंद्रियन की चेष्टान पै विजय करि कैं चित्त कूँ तन्मय करि देय हैं। न जें बिधाता नें कितेक अमृत के पूर सौं ये द्वै अच्छर ‘कृष्ण’ की रचना करी है। अहा! कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

रविवार, 18 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩


※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

🌹❄ *श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य* ❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌟 श्रीगोपदेवी-लीला :

मंगलाचरण

(श्लोक)

या वाऽऽराधयति प्रियं व्रजमणिं प्रौढानुरागोत्सवैः
संसिद्धयन्ति यदाश्रयेण हि परं गोविन्दसख्योत्सुकाः।
यत्सिद्धिः परमा पदैकरसवत्याराधनात्ते नु सा
श्रीराधा श्रुतिमौलिशेखरलतानाम्नी मम प्रीयताम्।।

अर्थ- जा प्रकार ब्रजमनि प्रियतम उनकौ आराधन करैं हैं, वाही प्रकार वेहू प्रकृष्ट अनुराग के उल्लास सौं परिपूर्ण है कैं अपने प्रियतम कौ आराधन करें हैं। गोबिंद के संग सख्य-भाव-प्राप्ति के ताईं उत्सुक जन हू जिन के आश्रय सौं आराधना करि कैं परम-सिद्धि कूँ प्राप्त होयँ हैं, जिन की सर्वोच्च उपलब्धि परमसाध्यरूपा अद्वितीय रसमयी स्थिति है, वे ही श्रीराधानाम्नी श्रुति-मौलि-शेखर-लता मोपै प्रसन्न होयँ।

सखी- अरी सखी, आज तैनें प्रातःकाल स्यामसुंदर के दरसन करे हे; कैसौ सुंदर सिंगार हौ?

दूसरी सखी- हाँ, सखी! दरसन तो करे हे। मैं तौ वा मनमोहिनी मूर्ति के दरसन करि कैं एकटक चित्र-लिखी सी रहि कई। स्याम तन पै पीताम्बर कैसी सौभा पाय रह्यौ हौ! हम सब ब्रजजुबतिन के मनन कूँ मोहि रह्यौ हौ। बलदार अलकावली गुरुजनन की लाज कूँ हटाय रही ही।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌹 श्रीकृष्णप्रवचनगोपी-प्रेम :

 (दोहा)

तीन लोक चौदह भुवन प्रेम कहूँ ध्रुव नाहिं।
पर- जगमग ह्वै रह्यौ रूप सौं श्रीबृंदाबन माँहि ।।
और ढूँढ़ि फिरैं त्रैलोक जो, मिलत कहूँ हरि नाहिं।
पर- प्रेमरूप दोउ एकरस बसत निकुंजन माँहि।।

हम दोऊ स्वरूप प्रेम-निकुंज के देवता हैं, और ये गोपी हमारी पुजारिन है, प्रेम की आद्याचार्य हैं। प्रेम-संप्रदाय गोपिन ते ही चल्यौ है, प्रेम की पद्धति इननें ही चलाई, और प्रेम कौ स्वरूप इननें हीं जगत कूँ दरसायौ है। यदि ये गोपी नहीं होतीं, तौ, प्रेम-शब्द ग्रंथन में हीं रहि जातौ। श्रीनारदजी ‘यथा व्रजगोपिकानाम्’ कहि कैं अपने ग्रंथ ‘भक्तिसूत्र’ में कौन कौ दृष्टान्त देते। और जो गोपी न होतीं तौ स्वयं मेरौ जो बाक्य- ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरण ब्रज’ है, याकौ स्वरूप प्रत्यक्ष करि कौन दरसावतौ। अजी, गोपी न होतीं तौ मेरी माखन-चोरी-लीला, पनघट-लीला, दान-लीला, मान-लीला, होरी-लीला, बंसी-लीला और रास-लीला नहीं होतीं। रसिकजन लुटि जाते, और स्वयं मैं हूँ पूरे ते आधौ रहि जातौ-पूर्णतम् स्वरूप ते न्यूनतम रहि जातौ! और यदि गोपी न होतीं तौ भक्ति जुबती ते फेर वृद्धा है जाती। श्रीनारदजी नें भक्ति सौं कही ही-

वृन्दावनस्य संयोगात्पुनस्त्वं तरुणी नवा।
धन्यं वृन्दावनं तेन भक्तिर्नृत्यति यत्र च।।

अर्थ- हे भक्तिदेवी! तुम बृंदाबन के संयोग ते फिर जुबती है गई हैं; याते ते बृन्दाबन धन्य है, जहाँ भक्ति नृत्य करै है। यह भक्ति गोपी-कृष्ण-लीला कूँ गाय-गाय कैं नृत्य करै है। यदि गोपी न होतीं तो मैं कौन के संग लीला करतौ, और भक्ति कहा गाय कैं नृत्य करती, बिचारी रोय-रोय कैं आप ही बूढ़ी है जाती। या प्रकार ये ब्रजगोपी मेरी ब्रज-लीला की आधार-स्वरूपा हैं, तथा स्वयं मेरी प्राण-जीवन-स्वरूपा हैं। याही सौं प्रेम-मंदिर में इनकौ स्थान सर्वोपरि है- गोपी प्रेम की धुजा हैं।

(दोहा)

जदपि जसोदा नंद अरु ग्वालबाल सब धन्य।
पै या जग में प्रेम की गोपी भईं अनन्य।।
भक्त जगत में बहुत हैं, तिन कौ नाहिं प्रमान।
हौं गोपिन के हिय बसौं, गोपी मेरे प्रान।।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

सोमवार, 12 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :

( गत ब्लाग से आगे )

🌟 श्रीकृष्णप्रवचनगोपी-प्रेम :

(पद)

गोपी प्रेम की धुजा ।
जिन गोपाल किये बस अपने, उर धरि स्याम भुजा।।
सुक मुनि ब्यास प्रसंसा कीनी, उद्धव संत सराहीं।
भूरि भाग गोकुल की बनिता अति पुनीत भव माँहीं।

(दोहा)

ब्रज-गोपिन के प्रेम की बँधी धुजा अति दूर ।
ब्रह्मादिक बांछत रहैं इन के पद की धूर ।।

अहाहा! देखौ, ये गोपी प्रेम-मंदिर की धुजा हैं। मंदिर में बिसेष ऊँचौ स्थान सिखर कौ होय है। सिखर के ऊपर कलसा होय है, कलसा के ऊपर चक्र होय है, चक्र के ऊपर धुजा होय है; परंतु धुजा के ऊपर कछु नहीं होय है। वो धुजा लहराय-फहराय कैं दूर ही ते कहैं है- ‘एरे पथिकौ, यह मंदिर है; यहाँ आऔ और श्रीहरि के दरसन करि नैन-मन सिराऔ, पाप नसाऔ और पुण्य कमाऔ। ऐसैं ही वे गोपी प्रेम-मंदिर की धुजा स्थान पै बिराजमान है कैं पुकारि-पुकारि कैं कहि रही हैं- ‘एरे संसार के जीवौ, यह ब्रज है, यहाँ आऔ। यह प्रेमकौ मंदिर है। प्रेम के देवी देवता श्री जुगलस्वरूप के दरसन करौ। प्रेम की ठाकुर यहीं है, प्रेम की उपासना यहीं है और प्रेम की सामग्री हू यहीं है। यातैं या प्रेमधाम में आऔ। यदि तुम्हारौ हृदय कारौ है तो यहाँ के कारे-गोरे रंग सौं ऊजरौ करि लेउ। और जो तुम्हारी धारना मैली है तौ यहाँ प्रेम की जमुनाधार ते पबित्र करि लेऔ । जो रुकि गई है तौ बहाय लेऔ। और सूखि गई है तौ सरसाय लेऔ। या श्रीवृंदाबन में प्रेम नदी चारों ओर बहि रही है, तुम यामें गीता लगाय कै पाप-ताप ते रहित है जाऔ! गोपी टेरि-टेरि कैं कह रही हैं-

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

रविवार, 11 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :
🌹 श्रीसाँझी-लीला :

( गत ब्लाग से आगे )

पद (रास सारंग बृंदाबनी, ताल चौताल)

बैठे हरि राधा संग कुंज भवन अपने रंग,
कर मुरली अधर धरें सारँग मुख गाई ।
मोहन अति हो सुजान, परम चतुर गुन-निधान,
जानि-बूझि एक तान चूकि कैं बजाई ।।
प्यारी जब गह्यौ बीन, सकल कला-गुन प्रबीन,
अति नबीन रूप सहित तान वह सुनाई।
बल्लभ गिरिधरन लाल रीझि दई अंक माल,
कहत भलैं जु सुंदर सुखदाई ।।
दोनौं कुंज भवन में बिराजै हैं।

 प्रीतम नें मुरली में सारंग राग कौ अलाप लीनौं, तामें एक तान जानि-बूझि कैं असुद्ध बजाई। ताकूँ सुनि कैं स्वामिनी जी ने बीन में वाही तान कूँ अद्भुत ढंग सौं प्रीतम कूँ सुनाई। तब प्रीतम नें बौहौत ही बड़ाई कीनी और प्रिया कौं आलिंगनरूप उपहार दीनौ।

सखी-

पद (राग नूरसारंग, ताल मूल)

चलौ किन देखन कुंज कुटी।
मदन गुपाल जहाँ मधि नाइक मनमथ फौज लुटी ।।
सुरत-समर में लरत सखी की मुक्ता-माल टुटी।
परमानँद गोबिंद ग्वालिनि की नीकी जोट जुटी।।

समाजी-

(कवित्त)

जेते द्रुम कुंजनि, कलप-बृच्छ ये प्रतिच्छ,
दोउन कौं बाँछित दई हैं निधि भलियाँ।
स्यामा-स्याम करैं केलि आनँद अलोल मत्त,
बेल नए नेह की अछेह फूल-फलियाँ।।
दंपति कौ सुख, सोई संपति है नैनन की,
नागरिया देखि-देखि जीवत हैं अलियाँ।
नैंक दिन-राति के बिहात की न जानी जात,
बंदाबन होत नित नई रंग-रलियाँ।।
बंदाबन आँनद बिहार चारू दंपति के,
ताकी दिन-रात बात सो सुनि जियौ करौ।
ललित हिंडोरा, साँझी, रास-रंग, दीपमाला,
फूलनि की कुंज रुचि रचना कियौ करौ।।
नित ही बसंत यहाँ, होरी चित चोरी चाव,
नागरिया केलि ये सकेलि कैं लियौ करौ।
दियौ करौ येई अरु येई सुख लियौ करौ,
येई दिन-रैन रस रसिक पियौ करौ।।

🌟🌟 श्री साँझी लीला संपूर्ण 🌟🌟

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :
🌹 श्रीसाँझी-लीला :

( गत ब्लाग से आगे )

(ठाकुरजी, दोऊ हाथन की अँजुरी बाँधि श्रीजी सौं रखवारी माँगैं)

समाजी-

(कबित्त)

साहस सँभारि स्याम आगैं आए प्यारी जू के,
रूप कौ अतुल भार परत न सह्यौ है।
बीच नील अंबर के बदन मयंक लखि,
चकित चितौन नें चकोर बृत्ति लह्यौ है।।
पायँ डुगलात जात, पीत पट छूटि गयौ,
नागरिया परत हियें धीरज न गह्यौ है।
पगे रूप चैननि में बैन न फुरत मन,
लियौ चाहैं हाथ मन, हाथ में न रह्यौ है।।
फूलन कौं गईं उत सखी सब जहाँ-तहाँ,
इत कौं रँगीले कछू और ढार में ढरे ।
रसिक रसाल बाल दियौ चाहै उर माल,
तब नन्दलाल हँसि आगैं हाथ लै करे।।
उरझी चितौन, कंप, स्वेद, स्वर भंग भए,
नागरिया नागर अनंग-रंग सौं भरे।
राधे जू दियौ हार मोतिन कौ मोहन कौं,
मोहन जू हार होय राधे के गरैं परे।।

(श्रीजी प्रीतम कूँ मोतिन कौ हार पहिरावैं, दोनों मिलि कैं कुंज में पधारे)

समाजी-

पद (राग केदारौ, ताल धमार)

रस भरे पिय-प्यारी बैठे कुसुम भवन ।
कुसुमन की सेज, और कुसुम बितान तने,
तैसोई सीत-मंद-संगध पवन ।।
कुसुमन के आभूषन, कुसुमन के परदा, कुसुमन केबीजना,
गुंजत अलि, पिक री सुख स्रवन।
गोबिंद बलि-बलि जोरी सदाईं बिराजौ,
सुख बरषत लालन राधिका-रवन।।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :
🌹 श्रीसाँझी-लीला :

( गत ब्लाग से आगे )

श्रीकृष्ण-

(कबित्त)

हमहू हैं राधे जू के, हमैं अपनाय लेऔ,
ज्यौंब मुख-सुधाधर देखि-देखि जीजियै।
निकट बुलाय मोहि, दामन लगाय राखौ,
सखी हौ कुँवरि जू की, खुनस न कीजियै।
हारे तुम आगें, बन-द्रुम हैं तिहारे अब,
नागरिया दोऊ ओर रसघन भीजियै।
नीकें सनमान कछु करि रखवारन कौ,
पाछें बहु फूलनि सौं फूलन कौं लीजियै।।

अरी, हमहूँ तौ श्रीराधेजू के ही हैं। नैंक हमैं हू अपनाय लेऔ, जासौ हमहूँ इनको मुखचंद देखि-देखि कैं जियौ करैं। मोय अपने ढिंग बुलाय कैं अपने आँचल कौ छोर पकराय अपनौ आस्त्रित बनाय कै कूं राखौ। तुम तौ श्रीराधा कुँवरि की प्यारी सहचरी हौ, यातें मेरे प्रति मन में नैंक हू खुनस मत रखौ। अब हम तिहारे आगें हारि गए, यहाँ की सब वस्तु तिहारी ही है; परंतु नैंक दया करि हमारौ हू ध्यान राखौ। हम याकी रखवारी करैं हैं, यासौं कछू हमारौ हू सनमान कर्यौ चहिए। वैसैं तौ सब बस्तु आपकी ही हैं। जो चहियै, सोई लै जाऔ।

सखी-

(कबित्त)

फूल हैं हमारे, हम लैहिंगी पै, तुम्हैं कहा,
ऐपै ऐसौ टोकिवौ न कीजै, बलिहारी जू।
दीनता करत ब्रजराज के कुँवर! अब,
पहिलैं जे बातैं कहीं, ते सब बिसारीं जू।।
नीकें रहौ नागर, बिमन न होउ ताते,
ह्वै कैं निसंक दिसि आइयै हमारी जू।
बन के बिहारी, लीजै द्रुम रखवारी, वारी,
त्ह्यारी मनुहारन सौं हमारी प्यारी हारी जू।।

अजी बनमाली जी! ये फूल-फल तौ हमारे ही हैं; हम लेयँ, चाहैं न लेयँ। आज सौं पाछैं हमकूँ ऐसैं कबहू मत टोकियो। पहिलैं तौ आप बड़े बढ़ि-बढ़ि कैं बोलि रहे हे, अब वे बातैं सब छोड़ि दई; जब कछू बस न चल्यौ, तब दीनता करिबे लगे। अच्छौ, कोई बात नायँ; “जब जागे, तबहि सवेरौ।” अब आप उदास मत होउ, हमारी स्वामिनी जी बाग की रखवारी में आप कूँ जो कछु दैं, सोई लै लेओ।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

सोमवार, 5 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :
🌹 श्रीसाँझी-लीला :

( गत ब्लाग से आगे )

श्रीकृष्ण-

(कबित्त)
हमहीं कौं चिंता या बन की रहत नित,
नित रखवारे रहैं, लाग्यौ चित चेतु है।
हम आठौं जाम सेवैं काम नृप धाम यह,
सहैं घन घाम अति, ताते हिय हेतु है।।
हमहीं सौं गहबर हर्यौ व्है रह्यौ है महा,
नागरिया प्यारौ मीनकेत-रस-खेतु है।
हमहीं कौं दैकैं लैनौं है सु लेहु, यौं
पराए फल-फूलनि कौं कौन लैन देतु है।।

सखी! या बन की चिंता तौ हमकूँ ही रहै हैं। हम याकी रखवारी करैं हैं, याकूँ सींचै है, धूप सहैं, जाड़ौ सहैं, तब ही तौ यह ऐसौ हर्यौ-भर्यौ दीख रह्यौ है। हाँ, तुमकूँ कछू फूल-फल लैनौं होय तौ हमें कछु रखवारी दैकैं तब लेऔ। ऐसैं तौ भलौ पराए फल-फूलनकूँ कौन लैन देयगौ।

 सखी-

(कबित्त)
कहा है परायौ, सब दीखत है राधेजू कौ,
बिना ही बिचारें झूँठे बचन क्यौं उचारे जू।
राधे ही की भूमि, खग-मृग सब राधे जू के,
राधे ही कौ नाम रटैं साँझ औ सकारें जू ।।
राधे ही के सुरबर ये तरुबर राधे ही के,
राधे ही के फूल-फल नागर निहारे जू ।
राधे ही कौ बृंदाबन, राधे की दुहाई फिरै,
तुम कौन लाला! हमैं हटकन हारे जू ।।

अजी! कहा परायौ-परायौ कह रहे हौ? यहाँ की जितनी बस्तु है, सब हमारी प्यारी राधेजी की है। देखौ, यहाँ की भूमि राधेजी की, ये खग-मृग सब राधेजी के, और ये दिन रात राधेजी कौ ही नाम रटैं हैं। यहाँ के सरोबर, यहाँ के सब बृच्छ, यहाँ के फूल और फल सब राधेजी के हैं। यह बृंदाबन हू राधे ही कौ है, और यहाँ दुहाई हू श्रीराधेजी की ही फिरै है। आप बिना ही बिचारें ऐसी झूठी बात कहि रहे हौ। आप हौ कौन, जो हमैं रोकि हौ?

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

शनिवार, 3 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :
🌹 श्रीसाँझी-लीला :

( गत ब्लाग से आगे )

सखी-

हँसि ललिता तब कह्यौ स्याम सौं, ये बृषभान-दुलारी ।
तिहारौ कहा लगै या बन में, रोकत गैल हमारी ।।2।।

श्रीकृष्ण-

स्याम सखा सखियन समुझावैं, हठ न करौ तुम प्यारी ।
फल-द्रुम, बन-बाटिका-सबनि के हमहीं हैं रखवारी ।।3।।

(कबित्त)

ऐसे या सघन बन निरजन के माँहि मैं,
आवती हू जानी नाहिं, जानी जब गाई हौ।
और है न संग कोऊ, एक-जाति जुबती सब,
बिनहीं बिचारैं जोर जोबन के धाई हौ ।।
अब फिरि जाहु आप-आपने भवन सब,
ठौर सु इकौसी फिरौ मदन-दुहाई हौ।
कैधौं तुम नागरी! हमैं समुझाय कहौ,
कौन की पठाई यहाँ, कौन काज आई हौ।।

अरी! तुम कौन हौ? कहाँ सौं आई हौ? मोय तिहारे आयवे की खबरहू नायँ परी, तिहारे संग पुरुषहू नायँ है, तुमकूँ यहाँ कौन नें भेज्यौ है और कहा आज सौं या निरजन बन में आई हौ?

सखी-

फूलन के बीनिबे कूँ आईं इहिं बन मिलि,
बूझिबे की हियें ऐसी धरनि व क्यौं धरी ।
टेढ़े ह्वै कैं ठाड़े, छली छैल! रोपि कैं छरी ।।
उचित नहीं, यहाँ अकेले रहौ जुबतिन में,
नागर! निकसि जाहु याही साँकरी गरी।
नाँ तौ अनबोले रहौ, छाँड़ौ मग मेरौ, हम
आबैंगी हजार बेर, तुम कौं कहाँ परी ।।

अजी! हम फूल बीनिबे कूँ आई हैं, आप हमें टोकिवे वारे को हौ? आपकी टेढ़ी चितवनि है, और टेढ़ी बात करौ हौ। और छरी हाथ में लैकैं टेढ़े हैंकै हमारी गैल रोकि कैं ठाड़े हौ। सखीन के बीच में रहनौ आपकूँ उचित नायँ है; यदि यहाँ रहनौ ही होय तौ चुपचाप ठाड़े रहौ। हम यहाँ हजार बार आवैंगी। तुमकूँ कहा परी या बात ते?

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :
🌹 श्रीसाँझी-लीला :

( गत ब्लाग से आगे )

सखी- वाकौ नाम कहा हौ?

श्रीजी- सखी! वाकौ नाम तौ मैं नायँ जानूँ; परंतु, हाँ, वाको स्याम तौ रंग हौ और वानें पीरे-पीरे वस्त्र पहरि राखे हे।

सखी- अरी, होयगौ कोई माली। अब बौहौत अबेर है गई, घर पधारौ।

श्रीजी- नायँ, एक बेर वाही कुंज में मोकूँ फिर लै चल।

सखी- प्यारी! काऊ माली सौं बिना हीं बात लरनौ परैगौ, घर चलौ ।

श्रीजी- नायँ सखी! मैं एक बेर तौ वहाँ जाऊँगी ही।

सखी- अच्छौ, नायँ मानौ तौ चलौ।

(सब सखी, श्रीजी फूल बीनती मालती-कुंज की ओर पधारैं)

समाजी-

ख्याल (राग बसंत, ताल द्रुत एकताल)

फुलवा बिनत डार-डार गोकुल की सुकुँवारि,
चंद-बदनि कमल-नैनि भानु की लली ।
एरी ए सुघर नारि, चलत न अंचल सम्हारि,
आवैंगे नंदलाल, देखि कैं डरी ।।

श्रीकृष्ण-

साँझी-फूल लैन, सुख दैन मन-नैननि कौं
स्यामा जू साथ जूथ जुबतिन के धाए हैं।
चलत अधिक छबि छाजत छबीलिनि के
रँगीले अंग-अंग रंग पट फहराए हैं।।
नागर निसान नाद नूपुर-समूह बाजैं,
अंग के सुबासनि सौं भ्रमर छूटि आए हैं।
बृंदाबन बीच पायँ धरत उठीं यौं गाय,
मानौं घन स्याम जानि मोर कुहकाए हैं।।

पद (राग-जंगला, ताल-कहरवा)

अरी तुम कौन हौ री, फुलवा बीननहारी ।।टेक।।
नेह लगन कौ लग्यौ बगीचा, फूलि रही फुलबारी ।
कृष्नचंद बनमाली आए, बोलौ क्यौं ना प्यारी ।।1।।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :
🌹 श्रीसाँझी-लीला :

( गत ब्लाग से आगे )

बिना कहें मेरौ पट सुरझायौ, इकटक मो तन रह्यौ निहारि ।।
पट सरुझाकर मन अरुझायौ, कहा कहूँ लज्जा की बात ।
हौं गुरुजन जर दबी जात री, इत वे सैननि हा-हा खात ।।
नाम न जानौं वाकौ, स्याम बरन हुतौ, पीत बरन बर हुतौ री दुकूल ।
वाहि बन लै चलि नागरिया फिरि बीनन साँझी के फूल ।।

सखी! मैं फूल बीनत-बीनत जमुना तट पै जाय पौहौंची। तहाँ अरनी की डार में मेरौ अंचल उरझि गयौ ।

सखी- तौ हम कौं क्यौं न बुलाय लीनी?

श्रीजी- अरी, मैंनें तुम सबन के नाम लै लै-कैं हेला दिए, परंतु काऊ नें नायँ सुनी।

सखी- तौ कौन नें सुरझायो?

श्रीजी- सखी! तब वा मालती कुंज में सौं लता हटामतौं भयौ मेरी ही दाईं एक बड़ोई सुकुमार निकसि कैंनें आयौ। वा बिना हीं कहें मेरौ अंचल सुरझाय दियौ और इकटक मेरी ओर देखिबे लग्यौ। वानें मेरौ वस्त्र तौ सुरझाय दियौ, परंतु मेरौ मन उरझाय लियौ। और तोसौं का कहूँ, कहिबे में लाज लगै है- सखी! मैं तो सकुच के मारैं दबी जाय रही और उतकूँ वह नैनन में हीं मेरी हाहा खाय रह्यौ।

( शेष आगे के ब्लाग में )

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹        
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※