सोमवार, 5 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹

🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :
🌹 श्रीसाँझी-लीला :

( गत ब्लाग से आगे )

श्रीकृष्ण-

(कबित्त)
हमहीं कौं चिंता या बन की रहत नित,
नित रखवारे रहैं, लाग्यौ चित चेतु है।
हम आठौं जाम सेवैं काम नृप धाम यह,
सहैं घन घाम अति, ताते हिय हेतु है।।
हमहीं सौं गहबर हर्यौ व्है रह्यौ है महा,
नागरिया प्यारौ मीनकेत-रस-खेतु है।
हमहीं कौं दैकैं लैनौं है सु लेहु, यौं
पराए फल-फूलनि कौं कौन लैन देतु है।।

सखी! या बन की चिंता तौ हमकूँ ही रहै हैं। हम याकी रखवारी करैं हैं, याकूँ सींचै है, धूप सहैं, जाड़ौ सहैं, तब ही तौ यह ऐसौ हर्यौ-भर्यौ दीख रह्यौ है। हाँ, तुमकूँ कछू फूल-फल लैनौं होय तौ हमें कछु रखवारी दैकैं तब लेऔ। ऐसैं तौ भलौ पराए फल-फूलनकूँ कौन लैन देयगौ।

 सखी-

(कबित्त)
कहा है परायौ, सब दीखत है राधेजू कौ,
बिना ही बिचारें झूँठे बचन क्यौं उचारे जू।
राधे ही की भूमि, खग-मृग सब राधे जू के,
राधे ही कौ नाम रटैं साँझ औ सकारें जू ।।
राधे ही के सुरबर ये तरुबर राधे ही के,
राधे ही के फूल-फल नागर निहारे जू ।
राधे ही कौ बृंदाबन, राधे की दुहाई फिरै,
तुम कौन लाला! हमैं हटकन हारे जू ।।

अजी! कहा परायौ-परायौ कह रहे हौ? यहाँ की जितनी बस्तु है, सब हमारी प्यारी राधेजी की है। देखौ, यहाँ की भूमि राधेजी की, ये खग-मृग सब राधेजी के, और ये दिन रात राधेजी कौ ही नाम रटैं हैं। यहाँ के सरोबर, यहाँ के सब बृच्छ, यहाँ के फूल और फल सब राधेजी के हैं। यह बृंदाबन हू राधे ही कौ है, और यहाँ दुहाई हू श्रीराधेजी की ही फिरै है। आप बिना ही बिचारें ऐसी झूठी बात कहि रहे हौ। आप हौ कौन, जो हमैं रोकि हौ?

( शेष आगे के ब्लाग में )

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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