🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹❄श्री राधाकृष्ण लीलामाधुर्य❄🌹
🌹 श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ :
🌹 श्रीप्रेम-प्रकाश-लीला :
( गत ब्लाग से आगे )
श्रीकृष्ण- हे किसोरी जू! आज आप कूँ जल भरिबे कूँ बहुत देर भई।
श्रीजी- कहा कहूँ, प्यारे? आप की लीला आप ही जानौ ।
(सवैया)
देखे बिना छिनहुँ, मन-मोहन! ये अँखियाँ अतिही अकुलानीं ।
लाज तजी, कुल-कानि नसी, तुम्हरे हित में नित आवत पानी ।।
अब तौ यह जीवन भार भयौ, अपने किए कौं आपुहि पछितानी ।
सगरौ ब्रज मेरौ जबाब करै, सो तजौं अब देह, यही मन ठानी ।।
प्यारे! अब या लीला कूँ यही समाप्त करि देउ। ब्रज की लुगाइन ने हमारी और आपकी बुराई करनौ ही जीवन कौ आदर्श बनाय राख्यौ है। सुनि-सुनि कैं हृदय जर्जर है गयौ है। कान बहिरे भए जाएँ हैं। यासौं या मृत्युलोक कौ जीवन असह्य है गयो है। काहू दिनाँ या देह कूँ जमुना में डुबोय दऊँगी, यही मनमें आवै है।
श्रीकृष्ण- प्रिये! धैर्य धारन करौ, अबहीं तौ प्रथम चरन है। अबहीं हमने जीवन-समूह के कल्याणार्थ तौ कछू कियौ ही नहीं है। अब कार्य प्रारंभ भयो है, सो आप सब जानौ हौ। आपनें गोलोक में जो सुदामा गोप कूँ श्राप दियौ और सुदामा नें आप कूँ मोते सौ बरस अलग रहिवे की बात कही, सोहू पूरी करनी हीं परैगी। आपनें ही या लीला की रचना करी है, अब याकूँ समयानुसार आप ही पूरी करौगी। यासौं जानि-बूझि भोरी मत बनौ। मेरे ऊपर सदैव ऐसी कृपा राखियौं, जासौ मैं सब कार्य में सफल होतौ रहूँ और याहू बात कौ आज निर्नय है जायगौ। अब आप घर पधारौ।
(श्रीजी अपने घर पधारैं)
श्रीकृष्ण- हाय! मेरे ही कारन किसोरी जी कूं इतनौ सहनौ परै है। जो सिव-बिरंचि-अंगिरादिकन के ध्यान में नहीं आवैं, वे ही मोते मिलिबे कूँ जमुना-जल के मिल सीस पै भारी गागर लैकैं नंगे पायन पधारैं हैं! प्यारो, यह कान्ह आपकौ अपराधी है, हे दयामयी, मेरे अपराध कूँ छमा करौ।
(श्रीकृष्ण कौ मूर्छित हौनौं) (पटापेक्ष)
(श्रीराधा अपने कक्ष में बैठी फूल-माला बनावैं, सामने श्रीकृष्ण कौ चित्र रहै)
( शेष आगे के ब्लाग में )
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹
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(सवैया)
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अब तौ यह जीवन भार भयौ, अपने किए कौं आपुहि पछितानी ।
सगरौ ब्रज मेरौ जबाब करै, सो तजौं अब देह, यही मन ठानी ।।
प्यारे! अब या लीला कूँ यही समाप्त करि देउ। ब्रज की लुगाइन ने हमारी और आपकी बुराई करनौ ही जीवन कौ आदर्श बनाय राख्यौ है। सुनि-सुनि कैं हृदय जर्जर है गयौ है। कान बहिरे भए जाएँ हैं। यासौं या मृत्युलोक कौ जीवन असह्य है गयो है। काहू दिनाँ या देह कूँ जमुना में डुबोय दऊँगी, यही मनमें आवै है।
श्रीकृष्ण- प्रिये! धैर्य धारन करौ, अबहीं तौ प्रथम चरन है। अबहीं हमने जीवन-समूह के कल्याणार्थ तौ कछू कियौ ही नहीं है। अब कार्य प्रारंभ भयो है, सो आप सब जानौ हौ। आपनें गोलोक में जो सुदामा गोप कूँ श्राप दियौ और सुदामा नें आप कूँ मोते सौ बरस अलग रहिवे की बात कही, सोहू पूरी करनी हीं परैगी। आपनें ही या लीला की रचना करी है, अब याकूँ समयानुसार आप ही पूरी करौगी। यासौं जानि-बूझि भोरी मत बनौ। मेरे ऊपर सदैव ऐसी कृपा राखियौं, जासौ मैं सब कार्य में सफल होतौ रहूँ और याहू बात कौ आज निर्नय है जायगौ। अब आप घर पधारौ।
(श्रीजी अपने घर पधारैं)
श्रीकृष्ण- हाय! मेरे ही कारन किसोरी जी कूं इतनौ सहनौ परै है। जो सिव-बिरंचि-अंगिरादिकन के ध्यान में नहीं आवैं, वे ही मोते मिलिबे कूँ जमुना-जल के मिल सीस पै भारी गागर लैकैं नंगे पायन पधारैं हैं! प्यारो, यह कान्ह आपकौ अपराधी है, हे दयामयी, मेरे अपराध कूँ छमा करौ।
(श्रीकृष्ण कौ मूर्छित हौनौं) (पटापेक्ष)
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